Tuesday, 11 July 2017

Bittersweet Monsoon

                                                                    [Pic courtesy: Wikipedia Commons]

There were times when thinking of monsoon brought before us imagery of joy. Of dark clouds overshadowing the sky, intermittent break of thunder claps and benevolent downpour wetting not only the land underneath, but also soaking us deep within for relief from fierce summer. One couldn’t resist from running into the rains to get drenched from head to toe and never missed opportunities to ditch boring raincoats or umbrellas.
As young girls on bicycles commuting to school under heavy monsoon downpours, we laughed at the disappointed faces of people trapped inside cars, buses or under shades, torn between the longing to get wet in rain and preventing their expensive ensembles from getting color washed. Those days, when deliberately jumping into puddles of water on roadsides, making paper boats, taking a rain shower or watching every green leaf swirl with joy, ran synonymous with a day of bountiful monsoon.
The neighboring muddy field suddenly got transformed into a football court, with boys of all age, sorts and sizes displaying their machismo while playing a sport which looked absolutely picture perfect in rain. Little children ran around the field’s periphery, chasing frogs and imitating their hop, while their concerned parents kept calling out for them to return home.
However, that was years ago.
Of late, the imagery of Monsoon has slightly changed.
One gets to know that rains have arrived in neighboring cities only once the social media timeline begins to get flooded with messages of traffic jams. Photos of hapless office goers commuting to their workplace in two hours for a distance they usually cover in twenty minutes, begins to do rounds on facebook. Angry emojis, distressed pictures of people caught in ruthless jamming of vehicles and even videos of verbal spats arising in a traffic going berserk, conveniently replaces happy memoirs of a rainy day.
In a place like Delhi which makes headlines for being eleventh most polluted city in the world, monsoon comes like an impending horror. A little drizzle and the half patched roads and pot holes at every second road turn, wait to swell into mini lakes. What looks like a small and neat puddle to splash into, might actually be a deep manhole that may gulp down an entire human body into city’s sewer drainage running into Yamuna.
One no longer drives to office but river rafts the vehicle through flooding roads. Obviously, the walk from parking to the building is also no less than swimming through a kiddie pool. While the hygiene conscious or high on maintenance colleagues of mine make faces of wrath at plight of dirty water around, the adventurous ones take to the game of filming garbage floating around and click ruthless pictures of the filth. Sharing on social media, however, would be an option contingent on the benevolence of the network provider, who most likely would have taken a day off on the occasion of rainy day.
One midnight some years ago, I not only got stranded in office for six hours but also lost connection with my family who finally swam their way through dark streets to rescue me.
I’ve come to believe that if there’s anything that can make life messier in an unmanageable monsoon, it is poor mobile connectivity.
Just in case it rains torrentially for over 24 hours, consider taking a boat ride in place of vehicles, local trains or metros to prevent getting marooned at one place. Besides, it’ll also give a feeling of riding a Gondola in Venice! How interesting is that! Drop the idea of taking a bath at home and instead, enjoy a natural waterfall under drainage pipes from buildings. This also encourages water conservation. How about snorkeling for goodies that got drowned in deep floods or roping in your friends to play Waboba in office?!
Disappointed with the rains, are you? Not everyone is. The few species that really make merry of the season are tiny monsters of Darwin who know how to ‘survive as the fittest’ in rainy froth and compost, littering in open streets – Mosquitoes, moths, bugs, viruses and flies!
Sometimes I wonder, why do we even call it raining ‘cats and dogs’ when it actually rains ‘mosquitoes and flies’ in monsoon?
Nevertheless, if there is anything that could bring a rainy day to a perfect closure, it is Single Malt or chilled Scotch, flavoured in liqueur aroma. If that doesn’t work, try our desi cup of hot ginger tea with some steaming homemade onion pakoras. A perfect panacea for relief from headache of traffic jams and fatigue of water sports we have had throughout the day. Thankfully, some nice things about Monsoon never change!

Sunday, 2 July 2017

मुझे सजाओगे?



तुमने क्या सोचा था?
कि सिल्क पर जरदोज़ी का काम की हुई
साड़ी का तोहफा देकर खुश कर दोगे मुझे?
हो जाती मैं...
पर तुमने साड़ी के साथ ही मुझे लाज का एक कपड़ा जो पहना दिया -
ढ़क के रखो
ऊपर से थोड़ा सा और नीचे से वो टांग भी
घर के भेद, तुम्हारी अम्मा के ताने, तुम्हारी बुरी आदते,
यारों के भद्दे मज़ाक, हमारी तू तू मैं मैं, मेरी शिकायते,
सब ढ़क लूँ मैं, छः फीट साड़ी के पीछे?

तुमने क्या सोचा था?
कि मीना जड़ी सोने कि खनकती चूड़ियाँ और मोती जड़े चांदी के छ्नकते झांझर
ब्याह में पहनाकर कर खुश कर दोगे मुझे?
हो जाती मैं
पर तुमने चूड़ियों और झांझर के साथ ही मुझे ताउम्र बेड़ियों में जकड़ लिया -
वहाँ मत जाना, उधर मत घूमना, इतनी देर घर से बाहर कैसे रह गयी तुम?
 किस्से पूछ कर गयी थी
और वो कमीना जिसे दोस्त बोलती हो, सोचा भी कैसे कि वो तुम्हें घर छोड़ेगा?
मायके में भी कोई इतने दिन रहता है भला?
उड़ना चाहती हो तो उड़ो पर याद रखना
एक बार जो तुम्हारे पाँव डगमगाए तो मेरी ये चूड़ियों ही संभालेगी, संभल के चलो।
उफ! बांध लूँ मैं खुद को तुम्हारी दहलीज़ कि चूड़ी से?

तुमने क्या सोचा था?
कि Loreal के मेकअप, Lakme कि lipstick और
Chanel के perfume कि खुशनुमा किट से खुश कर दोगे मुझे?
हो जाती मैं
पर तुमने मेकअप का एक ऐसा mask पहना दिया जो मेरा था ही नहीं -
नयी बहू के सिर पर पल्लू अच्छा दिखता है,
बड़ो के पैर छुआ करो फिट चाहे भले ही वो कपटता कि चलती फिरती दुकान क्यों न हों
ठीक है पड़ोस का लाला रोज़ पी कर गुंडागर्दी करता है,
तुमसे तो नहीं की न? फिर चुप बैठो!
अरे, कभी कभार गुस्सा आ जाता है तुम पर,
तो ऐसा क्या हो गया?
आँखों कि सूजन पर काजल के एक मोटी लकीर,
गाल पर पड़े उँगलियों के निशान पे गुलाबी blush
सिर की खरोच के किनारे पर लाल बिंदी,
और अंदर के घाव पे वक़्त का moisturizer लगाना ही तो है,
और हाँ, अपने होठो पर न सही, ज़ुबान पर lipstick लगाना मत भूलना
ताकि नाप तौल कर public में मुंह खोल सको
पर यार कुछ भी कहो, बहुत सुंदर दिखती हो तुम।
तुम्हें लगा, मुझे Mrs India सा महसूस होता है तुम्हारे दिये मेकअप के पीछे?

चार साल की थी जब सफ़ेद घोड़े पर सवार, वीर राजकुमार की कहानी सुनी थी
ना ना! वुश्वास थोड़े ही ना किया था!
मैं किसी कहानी के किताब के दबे अक्षरो में पिरोया पात्र थोड़े ही हूँ?
जीवित हूँ,
सोचती हूँ,
महसूस करती हूँ,
ज़िरह करती हूँ,
प्यार करती हूँ...
पर लगता है तुमने भी वो ही कहानी पढ़ी थी?
और हास परिहास में खुद को सफ़ेद घोड़े पर सवार वीर राजकुमार समझ बैठे
और मुझे?
साड़ी, चूड़ियो, झांझर, रंग और इत्र में लिपटी एक राजकुमारी
जो ठीक किताब की तरह चुप छाप पन्नो के बीच दबी रहती है
जो चाहे, जब चाहे खोल के पढे और ना पसंद आए तो, धपाक! Chapter close!

पर मैं तो बोलूँगी,
तब तक बोलूँगी जब तक तुम्हें ये ना दिखे
की मेरी साड़ी एक छह फीट का लबादा नहीं,
वो नरमाहट भरी छाह हैं जिसमे हर रात तुम अपना धिक्कार छिपाते हो,
वो ममता है जो तुम्हारे सात पुश्तो के घाव पर रेशम का मरहम लगती है,
द्रौपदी का वो तूफान है जो जब बंटता है, तो महाभारत के युद्ध का यालगार होता है,
जब फटता है, तो हर करुणावती का एक भाई तैयार होता है,
और जब कमर पे बांधता है, तो झाँसी के किले की 22 फीट की दीवार लांघ एक कोमलाङी का बिगुल बजता है
ये साड़ी नहीं क्षैतिज का वो चादर है
जो अगर फट पड़ा, तो सैलाब बरसागा!!

देखो, मैं तो बोलूँगी,
तब तक बोलूँगी जब तक तुम्हें ये ना दिखे
कि मेरी चूड़ी काँच की कमजोर कड़ियाँ नहीं,
वो खनक है जिसने तुम्हारे आँगन के हर कोने की मनहूसियन में रोजाना अपना मधुर संगीत छेड़ती है,
वो गोल चक्रवात है जिसकी दुनिया तुम्हारे प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है,
पर जब टूटती है तो जीवन से जुड़ी तुम्हारी एक डोर भी टूट सी जातो है।
कि मेरी lipstick होठों पर जमा लाल रंग का वो पैबंद नहीं,
वो सुर्ख चुंबन हैं, जो तुम्हारी काली कड़वी ज़ुबान पर बैठ उसे रंगीन कर देती है,
वो हस्ताक्षर हैं जो रात दर रात तुम्हारे शर्ट पर जीवन संगिनी होने की मीठी पहचान जड़ जाती है
पर जब बिखर पड़ता है तो खौलते खून के उबाल से नासूर छाले छोड़ जाता है।
कि तराशे काँच में रखा महंगा perfume, बोतल में बंद हमारे सपने नहीं
वो खुशनुमा हवा का झोंका है जो तुम्हारी रूह में मेरा प्यार और अस्तित्व, दोनों को घोलते है
और हमारे छोटे से घरोंदे को यादों की गमक से सराबोर कर देते हैं
पर जब बोतल से उड़ निकलते हैं, तो तुम्हारी दुनिया से सब कीमती लम्हे अपने साथ हमेशा के लिए ले जाते हैं।


दरअसल, मुझे खुश करना बहुत आसान है।
ज़्यादा भारी नहीं पड़ेगा तुम्हारी पॉकेट को,
बस कुछ छोटा मोटा समान जो इज्ज़त की दुकान में बेमोल मिलेगा,
साड़ी की जगह, उड़ने के लिए थोड़ा सा आसमान
चूड़ियों की जगह, तुम्हारे हाथ का सहारा
झाँझर की जगह, नन्हें सपनों के पहिये
Lipstick की जगह, मुझे ना बोलने का हक़
और इत्र की जगह, तुम्हारे भरोसे की गमक


क्यों, तो क्या सोचा तुमने, मुझे कैसे सजाओगे?

Wednesday, 26 April 2017

बाबा




अलसाई सी गर्मी की शाम है
घड़ी पर ठीक चार बजे हैं
एक नज़र जब चारो ओर देखती हूँ 
तो सब मीठी नींद में सो रहे है
कहीं खाली सोफा, तो कहीं सिकुड़ा सा लिहाफ
मेज़ पे रखा एक अदना सा ऐनक
तो कहीं जूते के अंदर ठूसा हुआ कल का पहना जुराब
अजीब सन्नाटा है।
रसोई से उबलते हुए पानी की खौल धीमे धीमे तेज़ हो रही है
बाबा चाय बना रहे हैं, ब्लैक टी,
आधी चम्मच चीनी,
दूर तक फैलती चाय की खूशबू
वही केतली
इसी वक़्त
हर रोज़
अपना सन्नाटा तोड़ते जीवन से रूबरू होती है
अपने थके कंधो और झुर्रियों भरे हाथों में
जीवन समेटे, चाय पीते,
मेरे बाबा
60 का दशक
एरिज़ोना स्टेट यूनिवरसिटि के कैम्पस में
विलक्षण प्रतिभा का स्वामी, सपनों की पोटली लिए नवयुवक
पराए देश में अपना कीर्तिमान बनाता हुआ,
अगल बगल गोरी मेम,
सफ़ेद घोड़े पर सवार, काऊबॉय hat, हाथ में बीयर,
पीले चार पहिये की नयी कार,
Green कार्ड,
हसीन शाम, रंगीन यादें
वो, मेरे बाबा
और समय फेरते हुए हवा का एक झौका
लाचार माँ, बुजुर्ग पिताजी, बहने, शहर में आधा बना एक मकान, टूटी इमारत,
नाज़ुक कंधों पर सबकी बलाएँ लिए
हसते हुए अपने सपनों को अलविदा कह
जिम्मेदारियों के सुरंग में डूबते,
मेरे बाबा
सन 1985 में खरीदी हल्के हरे रंग की बजाज स्कूटर
पर छरहहरा शरीर, पैंट-बुशर्ट-टाई डाले,
चिलचिलाती धूप और आँखों पर काला गोग्लस,
समय के आगे चलते, मेरे बाबा
स्कूटर पर पीछे नन्ही फ्रॉक पर दो चुटिया बनाए
उन्हे ज़ोर से कमर पर पकड़ कर बैठी हुई मैं
एक इंच से कम फासले में उम्र भर के सुरक्षा चक्र में
मुझे समेटे,
मेरे बाबा
मंदिर में दर्शन के लिए सारे परिवार को अंदर भेज
खुद बाहर खड़े जूतों की रखवाली करते, बाबा
सड़क पर चलने वाले नासमझ युवक के फेके हुए केले के छिलकों को
हाथ से उठाकर dustbin में फेकते, बाबा
विश्वविद्यालय के छात्र नेता के तमंचे की धमकी पर
अकेले खडे रह गलत के खिलाफ न्याय की आवाज़ उठाते, Prof. साहब, बाबा
और अपनी दोनों बेटीयो को साथ बिठाकर किताबों की दुनिया में
वेबर, Marx, Udao-Munda की सैर कराते, प्यारे बाबा
मनचली बड़ी ने स्वयंवर की ज़िद जो ठानी
उसके निर्णय को परिणय बना, सपनों को अंजाम देते, बाबा
हार कर जो रो पड़ी मैं तूफानो की चोट से
मेरी हिम्मत, मेरी ताकत, मेरी पहचान याद दिलाते, मेरे बाबा
चमड़ी के चीथड़े और खून की जो धार बही मेरे शरीर से,
अपने सफ़ेद कुर्ते से पोंछते, घाव के हर निशान से जीवन सिखाते, कैसे बाबा?
बढ़ते रहना, बहते रहना, सच्चे बन कर लड़ते रहना
जब हो तुम, जहां हो तुम, कर्म पथ का अलख बजाते, कर्मपंथी बाबा
अब मैं बड़ी हो गयी, वो भी बूढ़े हो चले
अब मैं अकेली चल रही, वो मगर कहीं ठहर गए
पाँव में उनके वो ताकत नहीं, स्टील की एक लंबी rod हैं
पर सपने अभी भी बुनते हैं, लिखते हैं, पढ़ते है
हर रोज़ दाई अक्षर जोड़ते हैं
मलयाली सीख रहे है, छोटे दामाद को घर में दिखाना है
Facebook और twitter करते हैं, grand-daughters को भी तो सीखाना है
घर का छोटा कोना है, पुराना laptop है,
अनगिनत किताबें, sheaffer के fountain पेन, आधे लिखे कागज के पुलिंदे
और अभी भी, उठते-गिरते, हर रोज़ बनते, उनके छोटे छोटे सपने।
रसोई से उबलते हुए पानी की खौल
आज फिर से धीमे धीमे तेज़ हो रही है
चार बज चुके हैं
वो जहां भी है, चाय बना रहे होंगे,
वही केतली
इसी वक़्त
अपना सन्नाटा तोड़ते जीवन से रूबरू होती है
अपने थके कंधो और झुर्रियों भरे हाथों में
जीवन समेटे, चाय पीते
वो, मेरे बाबा।
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